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भूमिका - मेरे अधूरे शब्द

“शीशे की दीवार के इधर उधर चलती दूरी जिंदगी यों के बीच एक गवाक्ष है …  एक झरोखा है … जहाँ से पूरा एक युग गुजर रहा है -- संस्कार और वर्ग की दीवारों की दरार टटोलने की बेचैनी गुज़र रही है …”

-- राजेन्द्र यादव, उपन्यास ‘शह और मात’ से


 

‘सारा आकाश’ को दोबारा पढ़ते हुए मुझे राजेंद्र यादव की ये पंक्तियाँ अनायास याद आई थीं और मैंने इसे उपन्यास  के पन्ने पर लिख लिया था। तब मुझे नहीं लगा था कि ये पंक्तियाँ ब्लॉग पर विद्यार्थियों के लिए लिखी जा रही सामग्री, जिसे वे नोट्स की तरह देखना चाहते हैं, की भूमिका में भी चली आएगी। मैंने ये पंक्तियाँ इसलिए लिखी थीं कि समर और प्रभा का जीवन भी ऐसे ही संस्कार और वर्ग की दीवारों की दरार टटोलने की बेचैनी में गुजरता है या यूं कहें कि निम्न मध्यमवर्गीय अस्तित्व के संघर्ष,  उसकी आशाओं, महत्वाकांक्षाओं और आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सीमाओं के बीच चलते द्वंद्व, हारने-थकने और कोई रास्ता निकालने की बेचैनी में गुजरता है। … जहाँ से पूरा एक युग गुजर सकता है।

समर और प्रभा के इस संधर्ष और बेचैनी का आकलन आज के विद्यार्थी न कर पाएं, पर उसकी पीड़ा से साक्षात्कार तो हो ही जाता है। शायद इसी कारण मैंने अपने विद्यार्थियों को कई बार पूछते पाया है कि समर आखिर इतना सोचता क्यों है? इतना बेचैन क्यों है ? क्यों वह अपने पिता से नहीं कह पाता कि उसे विवाह नहीं करनी है? क्यों जो सच है, वह अपने पिता के सामने नहीं रख पाता?  तब मुझे लगता है कि विद्यार्थियों के अंदर भी समर का द्वंद्व चलने लगा है, जिससे बच निकलने की बेचैनी उनके इन प्रश्नों में दिखती है।

कह सकते हैं कि सारा आकाश कृति के रूप में आजाद भारत की युवा पीढ़ी के वर्तमान की त्रासदी और भविष्य का नक़्शा है।हमारे सामने आश्वासन तो यह है कि सारी दुनिया और यह सारा आकाश हमारे सामने खुला है -- सिर्फ तुम्हारे भीतर इसे जीतने और नापने का संकल्प हो -- हाथ और पैरों में शक्ति हो ... 

मगर देखें तो असलियत यह है कि हर पाँव में बेड़ियाँ हैं और हर दरवाज़ा बंद है। युवा बेचैनी को दिखाई नहीं देता कि किधर जाएं और क्या करें। इसी में टूटता है, उसके तन - मन और भविष्य का सपना। फिर वह क्या करे --- पलायन, आत्महत्या या आत्मसमर्पण ?

आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी यह नक़्शा बहुत हद तक बदला नहीं है -- इन अर्थों में सारा आकाश एक ऐतिहासिक उपन्यास है और समकालीन भी।

सारा आकाश के अपने इन वेब-पोस्ट में मैंने कोशिश की है कि परीक्षा उपयोगी प्रश्नों के अलावा, विद्यार्थियों द्वारा पूछे गए उन प्रश्नों के उत्तर देने की कोशिश करूं,  जिन्हें समय के अभाव में बस छू भर दिया था।

- विशाल सिंह

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